किसी भी घाव को भर देता है ये सत्यानासी का पौधा –

सत्यानाशी ऐसा नाम है जिसे सुन के ही अजीब लगता है फिर भला यदि सत्यानाशी किसी पौधे का नाम हो तो कौन इसे अपने घर मे लगायेगा-

वनस्पतियो के मूल नाम विशेषकर अंग्रेजी नाम अच्छे होते है पर स्थानीय नाम उनके असली गुणो (दुर्गुण कहे तो ज्यादा ठीक होगा) के बारे मे बता देते है। इसी प्रकार मार्निंग ग्लोरी के अंग्रेजी नाम से पहचाना जाने वाला पौधा अपने दुर्गुणो के कारण बेशरम या बेहया के स्थानीय नाम से जाना जाता है।

सु-बबूल की भी यही कहानी है। यह अपने तेजी से फैलने और फिर स्थापित होकर समस्या पैदा करने के अवगुण के कारण कु-बबूल के रुप मे जाना जाता था।वैज्ञानिको को पता नही कैसे यह जँच गया। उन्होने इसका नाम बदलकर सु-बबूल रख दिया और किसानो के लिये इसे उपयोगी बताते हुये वे इसका प्रचार-प्रसार करने मे जुट गये। कुछ किसान उनके चक्कर मे आ गये। जब उन्होने इसे लगाया तो जल्दी ही वे समझ गये कि इसका नाम कु-बबूल क्यो रखा गया था। अब लोग फिर से इसे कु-बबूल के रुप मे जानते है। वैसे अंग्रेजी नाम भी कई बार वनस्पतियो की पोल खोल देते है। जैसे बायोडीजल के रुप मे प्रचारित जैट्रोफा को ही ले। जिस तेल से बायोडीजल बनाया जाना है उसे ही ब्रिटेन मे हेल आइल (नरकीय तेल) का नाम मिला है। यूँ ही यह नाम नही रखा गया है। वहाँ के लोग लम्बे समय से जानते है कि इस तेल मे कैसर पैदा करने वाले रसायन होते है। इसलिये उन्होने इसे यह गन्दा नाम दे दिया है।

अब हम सत्यानाशी पर आते है। यह वनस्पति आम तौर पर बेकार जमीन मे उगती है। इसमे काँटे होते है और इसे अच्छी नजर से नही देखा जाता है। घर के आस-पास यदि यह दिख जाये तो लोग इसे उखाडना पसन्द करते है। गाँव के ओझा जब विशेष तरह का भूत उतारते है तो इसके काँटो से प्रभावित महिला की पिटाई की जाती है। बहुत बार इस पर लेटा कर भी प्रभावित की परीक्षा ली जाती है। तंत्र साधना मे भी इसका प्रयोग होता है। आम तौर पर ऐसी वनस्पतियो से लोग दूरी बनाये रखते है। सत्यानाशी से सम्बन्धित दसो किस्म के विश्वास और अन्ध-विश्वास देश के अलग-लग कोनो मे अलग-अलग रुपो मे उपस्थित है। आम लोग जहाँ इसे अशुभ मानते है वही चतुर व्यापारी इससे लाभ कमाते है-

सरसो के तेल मे मिलावट और इसके कारण होने वाले ड्राप्सी रोग के विषय मे तो समय-समय पर पढा ही होगा। दरअसल मिलावट तेल मे नही होती है। मिलावट होती है बीजो मे। और सरसो के साथ ऐसे बीज मिलाये जाते है जो बिल्कुल उसी की तरह दिखते हो। भारत मे सबसे अधिक मिलावट सत्यानाशी के बीजो की होती है। व्यापारी बडे भोलेपन से यह कह देते है कि यह मिलावट हम नही करते है। यह खेतो मे अपने-आप हो जाती है। सरसो के खेतो मे सत्यानाशी के पौधे बतौर खरप्तवार उगते है। दोनो ही एक ही समय पर पकते है। इस तरह खेत मे ही वे मिल जाते है। वे यह भी कहते है कि सरसो को उखाड कर जब खलिहान मे लाते है तो सत्यानाशी के पौधे भी साथ मे आ जाते है। यह एक सफेद झूठ है। सत्यानाशी का पौधा सरसो के खेतो मे नही उगता है। जबकि ये यह बेकार जमीन की वनस्पति है-

आज के सरसो तेल मे वो बात नही है तो आप खीझ उठते है। पर यह कटु सत्य है कि सरसो के तेल मे सत्यानाशी की मिलावट होती है जो कि आपको सीधे नुकसान करती है।व्यापारी लोग बताते है  कि ऐसी मिलावट से सरसो के तेल की सनसनाहट बढ जाती है। आजकल लोग यही देखकर तेल खरीदते है। इसलिये इस तरह की मिलावट करनी होती है-

इसका वैज्ञानिक नाम आर्जिमोन मेक्सिकाना यह इशारा करे कि यह मेक्सिको का पौधा है पर प्राचीन भारतीय चिकित्सा ग्रंथो मे इसके औषधीय गुणो का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसका संस्कृत नाम स्वर्णक्षीरी सत्यानाशी की तरह बिल्कुल भी नही डराता है। यह नाम तो स्वर्ग से उतरी किसी वनस्पति का लगता है। यह बडे की अचरज की बात है कि सत्यानाशी के बीज जिस रोग को पैदा करते है उसकी चिकित्सा सत्यानाशी की पत्तियो और जडो से की जाती है। आज भी देश के पारम्परिक चिकित्सक सत्यानाशी के बीजो के दुष्प्रभाव हो ऐसे ही उपचारित करते है-

जबकि आयुर्वेदिक ग्रंथ ‘भावप्रकाश निघण्टु’ में इस वनस्पति को स्वर्णक्षीरी या कटुपर्णी जैसे सुंदर नामों से सम्बोधित किया गया है। इसके विभिन्न भाषाओ में नाम है –

संस्कृत- स्वर्णक्षीरी, कटुपर्णी।

हिन्दी- सत्यानाशी, भड़भांड़, चोक।

मराठी- कांटेधोत्रा।

गुजराती- दारुड़ी।

बंगाली- चोक, शियालकांटा।

तेलुगू- इट्टूरि।

तमिल- कुडियोट्टि।

कन्नड़- दत्तूरि।

मलयालम- पोन्नुम्माट्टम।

इंग्लिश- मेक्सिकन पॉपी।

लैटिन- आर्जिमोन मेक्सिकाना।

यह कांटों से भरा हुआ, लगभग 2-3 फीट ऊंचा और वर्षाकाल तथा शीतकाल में पोखरों, तलैयों और खाइयों के किनारे लगा पाया जाने वाला पौधा होता है। इसका फूल पीला और पांच-सात पंखुड़ी वाला होता है। इसके बीज राई जैसे और संख्या में अनेक होते हैं। इसके पत्तों व फूलों से पीले रंग का दूध निकलता है, इसलिए इसे ‘स्वर्णक्षीरी’ यानी सुनहरे रंग के दूध वाली कहते हैं।

इसकी जड़, बीज, दूध और तेल को उपयोग में लिया जाता है। इसका प्रमुख योग ‘स्वर्णक्षीरी तेल’ के नाम से बनाया जाता है। यह तेल सत्यानाशी के पंचांग (सम्पूर्ण पौधे) से ही बनाया जाता है। इस तेल की यह विशेषता है कि यह किसी भी प्रकार के व्रण (घाव) को भरकर ठीक कर देता है।

व्रणकुठार तेल बनाये :-

निर्माण विधि :-

आप इस पौधे को सावधानीपूर्वक कांटों से बचाव करते हुए, जड़ समेत उखाड़ लाएं। इसे पानी में धोकर साफ करके कुचल कर इसका रस निकाल लें। फिर जितना रस हो, उससे चौथाई भाग अच्छा शुद्ध सरसों का तेल मिला लें और मंदी आंच पर रखकर पकाएं। जब रस जल जाए, सिर्फ तेल बचे तब उतारकर ठंडा कर लें और शीशी में भर लें। यह व्रणकुठार तेल है। जेसे अगर 200 ग्राम रस है तो 50 ग्राम ही शुद्ध घानी का सरसों का तेल डाले और पक के वापस 50 ग्राम तेल बचे तो रख ले –

प्रयोग विधि : –

किसी भी प्रकार के जख्म (घाव) को नीम के पानी से धोकर साफ कर लें। साफ रूई को तेल में डुबोकर तेल घाव पर लगाएं। यदि घाव बड़ा हो, बहुत पुराना हो तो रूई को घाव पर रखकर पट्टी बांध दें। कुछ दिनों में घाव भर कर ठीक हो जाएगा।ये घाव ठीक करने की अचूक दवा है अगर पुराना नासूर है तो भी ये दवा उतनी ही कारगर है-

उपचार और प्रयोग-

आपका एक उपवास रोग-निवारक के साथ-साथ शक्तिवर्धक भी है …!

 * आप जानते है कि व्यवस्थित रूप से चलने वाले दफ्तरों, कारखानों में सप्ताह में एक दिन अवकाश का रहता है। कहीं- कहीं तो पाँच दिन का भी सप्ताह माना जाने लगा है, और दो दिन छुट्टी में हलके- फुलके रहने के लिए मिलते हैं। यह छुट्टी में प्रत्यक्ष काम की हानि होती हुई दीखती है, किंतु परोक्ष में उससे लाभ ही रहता है। दो दिनों में हलका- फुलका रहकर व्यक्ति अधिक उत्साहपूर्वक अधिक मात्रा में काम कर सकता है।
* जी हाँ -यही बात पाचनतंत्र के बारे में भी है। पेट, आमाशय, आँतें मिलकर एक तंत्र बनता है, इसमें फूलने सिकुड़ने की क्रिया होती रहती है, और उलट पुलट के लिए जगह की गुंजाईश रखे जाने की आवश्यकता पड़ती है। इस सारे विभाग में ठूँसा -भरा जाए और कसी हुई स्थिति में रखा जाए, तो स्वभावतः पाचन में बाधा पड़ेगी, अवयवों पर अनावश्यक दबाव- खिंचाव रहने से उनकी कार्यक्षमता में घटोतरी होती जाएगी। उन अंगों से पाचन के निमित्त जो रासायनिक स्राव होते हैं, उनकी मात्रा न्यून रहेगी और सदा हल्की- भारी कब्ज बनी रहेगी। खुलकर दस्त होने और पेट हलका रहने की वह स्थिति न बन पड़ेगी जो शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

* पाचन तंत्र ही आहार को रक्त के रूप में परिणत करने की आश्चर्य भरी प्रयोग शाला चलाता है। इसके कलपुर्जों से अनावश्यक छेड़खानी नहीं करनी चाहिए। इससे कई प्रकार की परेशानियाँ व्यर्थ ही उत्पन्न होती हैं। अधिक मात्रा में खाना, इसी तोड़ फोड़ का प्रत्यक्ष स्वरूप है।

* आयुर्विज्ञान ने इसी तथ्य का यह कहकर समर्थन किया है कि कम मात्रा में खाया हुआ, अच्छी तरह पच जाता है। फलतः वह अधिक ठूँसने की तुलना में आर्थिक बचत भी करता है। अंगों को सुव्यवस्थित भी रखता है और पोषण भी अधिक मात्रा में प्रदान करता है।

* वृद्धावस्था के लिए तो यह अनिवार्य अनुशासन है कि वे अपने पाचन तंत्र की क्षमता को देखते हुए आहार की मात्रा घटाएँ। यह न सोचें कि ऐसा करने से शक्ति सामर्थ्य घटेगी, किंतु देखा इससे ठीक उलटा गया है कि मात्रा घटा देने पर आहार सही रूप से पचता है, वह उपयुक्त पोषण बढ़ाता है और पाचन तंत्र में विकृति नहीं खड़ी होने देता।

* बच्चों के आहार के संबंध में भी यही सावधानी बरती जानी चाहिए। हर वयस्क उन्हें प्रेम प्रदर्शन के रूप में अपने साथ खिलाने लगे, तो उसका परिणाम यह होता है कि उन्हें बार- बार खाने की, बड़ों जैसे गरिष्ठ पदार्थों को लेने की आदत पड़ जाती है। इस कारण उत्पन्न होने वाले संकटों से बचने के लिए यही उचित है .

* बच्चों को खाते समय पास भले ही बिठा लिया जाए, पर उनके आहार का स्तर, अनुपात एवं समय सर्वथा भिन्न रखा जाए। कोमल पेट पर अनावश्यक मात्रा थोपना एक प्रकार से उनके मरण की पूर्व भूमिका विनिर्मित करना है।

* उपवास को धर्म प्रयोजनों में बढ़- चढ़कर महत्त्व दिया गया है। धार्मिक प्रकृति के लोग वैसा करते भी रहते हैं। महिलाओं में इसके लिए अधिक उत्साह एवं साहस देखा जाता है। पर इस संदर्भ में जो अनियमितता बरती जाती है, वह सब प्रकार से खेदजनक है।

* उपवास के दिन फलाहारी समझे जाने वाले कूटू, आलू, सिंघाड़ा आदि गरिष्ठ पकवानों को स्वादिष्टता के कारण और भी अधिक मात्रा में खाया जाता है। फलतः परिणाम ठीक उलटा होता है। मात्रा घटाने और सात्विकता बढ़ाने के रूप में ही फलाहार हो सकता है। जब नाम फलाहार है तो उसे शब्दों के अनुरूप ही होना चाहिए। ताजे सुपाच्य पेड़ के पके फल आवश्यकतानुसार फलाहार में एक बार लिए जा सकते हैं।

* अधिक मँहगे और कोल्डस्टोरों में रखे होने के कारण शाकाहार से काम चलाना चाहिए। ताजे फल मिल सकें, तो वे भी ठीक रहते हैं। अच्छा तो यह है कि शाकों को उबालकर बनाया हुआ रस या फलों का रस काम में लिया जाए । दूध, दही, छाछ जैसी प्रवाही वस्तुएँ भी काम दे सकती हैं। यह सब जंजाल भी जितना कम किया जाए, उतना ही अच्छा।

* वास्तविक उपवास वह है, जिसमें पानी तो बार बार और अधिक मात्रा में पिया जाए, पर पेट पर वजन डालने वाला कोई भी आहार न लिया जाए, छुट्टी- सो। उस दिन पेट को एक प्रकार से पूर्ण विश्राम लेने दिया जाए। सफाई करने के लिए गुनगुने पानी में नींबू का रस, तनिक- सा खाने का सोडा और शहद अथवा गुड़ मिलाकर दिन में कई बार चाय की तरह पीया जा सकता है ।

* अच्छा लगे तो इस पेय में तुलसी की थोड़ी- सी पत्तियाँ भी डाली जा सकती हैं। इस पेय से पेट की सफाई भी होती है और भूख के कारण पेट में जो ऐंठन पड़ती है, उसकी संभावना भी नहीं रहती।

* पशु- पक्षियों में से कोई कभी बीमार पड़ता है तो वे अपना उपचार स्वयं करते हैं। भोजन बंद कर देते हैं निराहार रहने से शरीर में अन्यत्र काम करने वाली जीवनी शक्ति एकत्रित होकर रोग निवारण में लग जाती है और वे इतने भर उपचार से रोगमुक्त हो जाते हैं। मनुष्यों के लिए भी इस आधार को अपनाना रोगमुक्ति का सर्वसुलभ उपचार सिद्ध हो सकता है।

* सप्ताह में एक दिन का पूर्ण उपवास करना ही चाहिए। इतनी छूट सुविधा तो पाचन तंत्र को देनी ही चाहिए।

* शरीर जुकाम, खाँसी, ज्वर आदि की चपेट में आ गया हो तो एक दिन से अधिक का उपवास भी किया जा सकता है। निराहार उपवास आरम्भ करने से पहले कम से कम एक बार तो खिचड़ी जैसा हल्का भोजन करना ही चाहिए। उपवास तोड़ने के बाद भी आरम्भ में एक बार फिर क्रमशः थोड़ा हलका भोजन लेने के उपरांत ही सामान्य ढर्रे पर आना चाहिए।

उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग-

यदि आप जूस पीने के शौकीन है तो येसे पिए जूस …!

* जी  हाँ आप अगर वास्तव में सेहत के लिए जूस पीते है तो आपको एक ही गिलास में आपको विटामिन-बी,सी,इ, और आयरन तथा और भी न जाने क्या क्या फायदे मिल सकते हैं|

एक ही सब्जी या फल के जूस के बजाये इन्हें मिला-जुलाकर पीना अधिक पोष्टिक होता है|यहाँ ऐसे ही कुछ मिश्रणों के बारे में बताया जा रहा है…

पपीता+दूध:-
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* दूध पने से आपको सिर्फ कैल्सियम मिलता है|यदि आप पपीता और दूध एक साथ पियेंगे तो आपको विटामिन क,ए और आयरन एक साथ मिलेंगे|इनका सेवन त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद होता है|

दूध+केला:-
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* दूध और केला का मिश्रण आपको एनेर्जी प्रदान करता है|यह वजन बडाने में भी सहायता करता है|यह पाचन सम्बन्धी कमियों को दूर करता है|

संतरा+अदरक+खीरा:-
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* इनका मिश्रण त्वचा की कान्ती बदाता है और नमी को बनाये रखता है|इसमें मोजूद विटामिन सी सर्दी-खांसी को नियंत्रित रखने में सहायक है|

गाजर+सेब+नाशपाती+आम:-
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* गाजर+सेब+नाशपाती+आम के जूस की तासीर ठंडी होती है|इस मिश्रण के सेवन से शरीर की गर्मी और अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकलते हैं|यह जूस रक्तचाप का संतुलन बनाये रखने में भी सहायक होगा|

खरबूजा+अंगूर+तरबूज+दूध:-
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* स्वास्थ्य जीवनशैली के लिए रोग प्रतिरोधक श्रमता का मजबूत होना बहुत जरूरी है|खरबूजा,अंगूर,तरबूज,और दूध का मिश्रण विटामिन क और बी से भरपूर होता है,जो शरीर की रोग प्रतिरोधक श्रमता बढ़ाने में मदद करता है|

सेब+कीवी+खीरा:-
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* इस मिश्रण से आपको वोतामिन बी,सी ,आयरन और मिनरल्स मिलेंगे|यह कब्ज दूर करने में भी सहायक होगा|यह आपकी त्वचा को स्वास्थ्य बनता है और निखारता है|
उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग-

कई बीमारियों का एक साथ छोटा सा प्रयोग ….!

* तुलसी की 21 से 35 पत्तियाँ स्वच्छ खरल या सिलबट्टे (जिस पर मसाला न पीसा गया हो) पर चटनी की भांति पीस लें और 10 से 30 ग्राम मीठी दही में मिलाकर नित्य प्रातः खाली पेट तीन मास तक खायें।

* ध्यान रहे दही खट्टा न हो और यदि दही माफिक न आये तो एक-दो चम्मच शहद मिलाकर लें।

* छोटे बच्चों को आधा ग्राम दवा शहद में मिलाकर दें। दूध के साथ भुलकर भी न दें। औषधि प्रातः खाली पेट लें। आधा एक घंटे पश्चात नाश्ता ले सकते हैं। दवा दिनभर में एक बार ही लें

* कैंसर जैसे असह्य दर्द और कष्टप्रद रोगो में २-३ बार भी ले सकते हैं।

* इसके तीन महीने तक सेवन करने से खांसी, सर्दी, ताजा जुकाम या जुकाम की प्रवृत्ति, जन्मजात जुकाम, श्वास रोग, स्मरण शक्ति का अभाव, पुराना से पुराना सिरदर्द, नेत्र-पीड़ा, उच्च अथवा निम्न रक्तचाप, ह्रदय रोग, शरीर का मोटापा, अम्लता, पेचिश, मन्दाग्नि, कब्ज, गैस, गुर्दे का ठीक से काम न करना, गुर्दे की पथरी तथा अन्य बीमारियां, गठिया का दर्द, वृद्धावस्था की कमजोरी, विटामिन ए और सी की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग, सफेद दाग, कुष्ठ तथा चर्म रोग, शरीर की झुर्रियां, पुरानी बिवाइयां, महिलाओं की बहुत सारी बीमारियां, बुखार, खसरा आदि रोग दूर होते हैं।यह प्रयोग कैंसर में भी बहुत लाभप्रद है।

उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग-

आप अपने जीवन में रसाहार को शामिल करे जाने इसके फायदे …!

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जी हाँ -रसाहार प्रकृति का चमत्कार है ..

* आज आहार का विज्ञान काफी आगे बढ़ चुका है। बहुआयामी खोजों से यह सत्य उद्घटित हो गया है कि रस के आहार (रसाहार) से न केवल आवश्यक शक्तियां ही प्राप्त होती हैं वरन शरीर की रोगों के प्रतिरोध की क्षमता भी कई गुना बढ़ जाती है।

* रसाहार के लिये फल, सब्जी या अंकुरित अनाज आदि खाद्यों को पूर्णतया ताजा ही काम में लें। सड़े, गले, बासी, काफी देर से कटे हुए खाद्य पदार्थ का नहीं, अपितु रोगाणुओं से मुक्त आहार सामग्री का ही रस निकालें, अन्यथा तीव्र संक्रमण हो सकता है।

आप रसाहार कैसे लें :-
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* आप ये ध्यान रक्खे कि ताजा रस ही काम में लें। निकालकर काफी देर तक रखा हुआ रस न लें। रखे रस में एन्जाइम सक्रियता, थायमिन, रिबोफ्लेविन, एस्कार्बिक एसिड आदि उपयोगी तत्व नष्ट होने लगते हैं तथा वातावरण के कुछ हानिकारक कीटाणु रस में प्रवेश कर रस को प्रदूषित कर देते हैं। ऐसा रस पीने से तीव्र प्रतिक्रिया होती है।

* रसाहार बैठकर धीरे धीरे पियें। इसे प्याला या ग्लास में ही लेना चाहिय। ग्लास को मुंह की ओर ऐसे झुकायें कि ऊपरी होंठ रस में डूबा रहे। ऐसा करने से वायु पेट में नहीं जाती।

रस कैसे निकालें :-
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ठोस फल या सब्जियों:-
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* ककड़ी,लौकी,गाजर, टमाटर ,, अनानास, नाशपाती, आलू, सेवादि, का रस निकालने के लिये विभिन्न प्रकार की मशीनें आती हैं। संतरा, मौसम्मी , चकोतरादि नींबू कुल के फलों की अलग तरह की मशीनें आती हैं। बिजली से चलने वाली मशीनों की अपेक्षा हाथ से चलने वाली मशीनों से निकला रस श्रेष्ठ माना जाता है।

* सब्जी को कद्दूकश से कसने के बाद या कूटकर भी रस निकाला जाता है। रस निकालने के बाद बचे हुये खुज्झे को फेंके नहीं- इसे बेसन/आटे में मिलाकर रोटी बनाकर काम में लिया जा सकता है। यह खुज्झा पेट की सफाई कर कब्ज को दूर करता है।

कब क्या रसाहार ले :-
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कब्ज :-
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*  सारे रोगों की जननी है। इसमें सब्जी तथा फलों को मूल रूप में खायें। गाजर, पालक,टमाटर, आंवला, लौकी, ककड़ी, ६ घंटे पूर्व भीगा हुआ किशमिश, मुनक्का,अंजीर, गेहूंपौध, करेला, पपीता, संतरा, आलू, नाशपाती, सेव तथा बिल्व का रस लें।

अजीर्ण अपचन:-
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* भोजन के आधे घंटे पहले आधी चम्मच अदरक का रस। अनानास, ककड़ी, संतरा, गाजर, चुकन्दर का रस।

उल्टी व मिचली:-
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* नींबू, अनार, अनानास, टमाटर ,संतरा, गाजर, चुकन्दर का रस।

एसीडिटी:-
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* पत्ता गोभी+गाजर का रस, ककड़ी, लौकी, सेव, मौसम्मी, तरबूज, पेठे का रस, चित्तीदार केला, आलू, पपीता।

एक्यूट एसीडीटी:-
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* ठंडा दूध, गाजर रस।

बार- बार दस्त आना:-
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* बिल्व फल का रस, लौकी, ककड़ी, गाजर का रस डेढ़ चम्मच ईसबगोल की भुस्सी, छाछ ईसबगोल की भुस्सी।

पीलिया :-
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* करेला, संतरा, मौसम्मी, गन्ना, अनानास, चकोतरा का रस,पपीता, कच्ची हल्दी, शहद, मूली के पत्ते, पालक तथा मूली का रस।

मधुमेह (शुगर):-
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* जामुन, टमाटर, करेला, बिल्वपत्र, नीम के पत्ते, गाजर पालक टमाटर, पत्ता गोभी का रस।

पथरी:-
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* सेव, मूली व पालक, गाजर, इमली, टमाटर का रस लें। फल एवं सब्जियों के नन्हें बीज न लें।

गुर्दे के रोग:-
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* तरबूज, फालसा, करेला, ककड़ी, लौकी, चुकन्दर, गाजर, अनानास, अंगूरादि खट्टे फलों का रस, इमली, टमाटर।

गले का रोग:-
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* गर्मपानी, गर्मपानी एक नींबू शहद, अनानास,गाजर चुकन्दर पालक, अमरूद प्याज लहसुन का रस।

खांसी:-
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* गर्म पानी, एक नींबू रस शहद, गाजर रस, लहसुन, अदरक, प्याज, तुलसी का रस मात्र ५० सी.सी. लें।

अनिद्रा:-
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* सेव, अमरूद, लौकी, आलू,गाजर पालक, सलाद के पत्ते, प्याज का रस।

मुंहासे:-
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* गाजर पालक, आलू गाजर चुकन्दर अंगूर, पालक टमाटर, ककड़ी का रस।

रक्तहीनता:-
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* पालकादि पत्ते वाली सब्जियों, टमाटर, आंवला, रिजका, चुकन्दर, दूर्वा, पत्ता गोभी, करेला, अंगूर, खुरबानी, भीगा किशमिश, मुन्नका का रस।

मुंह के छाले:-
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* चौलाई, पत्तागोभी, पालक, टमाटर,ककड़ी व गाजर का रस।

उच्च रक्तचाप:-
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* प्याज, ककड़ी, टमाटर, संतरा, लौकी, सोयाबीन का दही, गाय की छाछ, गाजर व मौसम्मी का रस।

वजन वृद्धि हेतु:-
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* अनानास, पपीता, केला, दूध, संतरा, आम आदि अधिक कैलोरी वाले मीठे फलों का रस।

वजन कम करने हेतु:-
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* तरबूज, ककड़ी, लौकी, पालक, पेठा, टमाटर, खीरा आदि कम कैलोरी वाली सब्जियों का रस।

उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग-